Video by marham_poetryandmusic
Marham · 137 words · 1 min read · EN
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शुक्र करो के बोल रही हूं, मन के भाव खोल रही हूं जिस दिन तुम्हारी बातों में मैं तर्क वितर्क न कर पाऊं जो तुम कहो मुझे ठीक लगे, चुप चाप मैं बस सुनती जाऊं या बिना बात रखे अपनी, तुम्हारी हां में हां मिलाओ तब तुम खुछ समझ जाना संभव है शब्दों में समझा न पाऊं
कि दिल से तो मैं उधर चुकी हूँ कि लगता होगा हूँ मैं तुम्हारी तुम्हारी तो अब नहीं बजे प्रेम दिखे शायद मुख पर सत्य है ये वो जूटा है जो बिखर न पाए तुम्हारे आगे वो व्यक्ती भीतर से रूठा है और जुड़ता नहीं है ऐसा इंसान जो इस कदर यो धीरे धीरे तूटा है
उम्मीद अभी भी टटोल रही और शुक्र करो के बोल रही हूँ मन के भाव खोल रही हूँ शुक्र करो के बूल रही हूँ
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