Video by tarkik_jagat
Bharti kushwaha · 283 words · 1 min read · EN
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आप ये तो मानते हैं कि असलीलता फैलाना गलत बात है। परउन समस्थिया यह है कि हम असलीलता को परिभासित कैसे करें। हम किस चीज को असलील उसमाने में रूम से जो वियता हैं गाम इसकर अचनल को मलतां हो तो आदमी इसकी महतना पर नाय। असलीलता बहुत कुछ आदमी की दिमाग में भी होतीए कि बहुत लोगों को लगता है कि असलीलता की संबन्द महलाओं के चोटे कपड़ों से नहीं है।
कुछ वान्हेसा पिसलिय नगणनवस्था में रहती थी यह नहीं कह सकते हैं कि वह समाज में अस्लीलता है वहले थी क्योंकि उनके कपड़े त्यागने का उद्देश यह नहीं था कि वो सबका ध्यान अपनी तरफ
कौन कपड़े खरीदे, पहने, उतारे, धोए, कौन इस जंजट में पढ़े, समय का सवधु प्योग करें और कपड़ों का त्याग करें परन्तु आज हम मतलब कपड़े बहुत जादा भी पहनते हैं पर उसमें रणनेतिक तरीके से इस तरह का नियत रखते हैं कि सब पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़े सब को दूसरों को प्रभावित कर सके
तो साइद ये गलत हो सकता है और असलीलता की बात करते हुए हमें ये भी नहीं कर सकते हैं कि हम स्रिंगार रस को साइद से बिल्कुल से हटा दें क्योंकि यह हमारे जीवन का बहुत ही ज़रूरी हिस्टा है और सायद सुन्दर भी है तो उसे ऐसा करना सायद गलत होगा परांतो स्रिंगार्स का वरणन करने में
और असलीलता फैलाने में अंतर होता है और हमें उस अंतर को समझना चाहिए और मेरी समझ से हर वो चीज साहित में फिल्मों में सिनेमा में गलत है जो हमारी जन्मजाद दुर्गुणों को भढ़काती है जैसे कि काम, क्रोध, लोब, मौह, अहंकार, ईर्सिया जिसे सेगमेंट फ्रोइड की वासा में इड करते हैं तो जो चीज इड को भढ़काती है उ
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